महात्मा गांधी का सपना हुआ पूरा, सौ साल बाद आखिर पहुंच ही गए लोमराज बाबू के गांव

सुदिष्ट नारायण ठाकुर: मोहनदास करमचंद गांधी का सपना भले ही पूरा नहीं हुआ लेकिन चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष के गांधी का लोमराज बाबू के गांव जसौली पट्‌टी जाने का सपना रविवार को जरूर पूरा हो गया। तो फिर सत्याग्रह शताब्दी स्मृति का तामझाम क्यों? गांधी जहां नहीं जा पाए वहां उन्हें पहुंचा दिया या तो सत्याग्रह किस बात की? लोमराज बाबू की जिस निर्भिक छवि से अंग्रेज भी घबराते थे, अगर बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी जसौली पट्‌टी पहुंच जाते और वहां उनसे मिल लेते तो चंपारण से उसी दिन एक बड़े किसान आंदोलन की शुरूआत हो जाती। इसलिए गांधी को चंद्रहिया के पास ही रोक कर चंपारण छोड़ने का सम्मन थमा दिया गया। इसके बाद सत्याग्रह हुआ, जो विश्व के इतिहास में दर्ज हो गया। लेकिन चंपारण सत्याग्रह शताब्दी स्मृति के लिए जो मोहनदास करमचंद गांधी के लिए पात्र चुने गए उनमें धैर्य की कमी दिख रही है। गांधी की गंभीरता इनमें कहीं नहीं दिखती। गांधीजी 15 अप्रैल 2017 को मोतिहारी आए थे, लेकिन शताब्दी के गांधी 13 अप्रैल को ही मोतिहारी पहुंच कर जिला स्कूल में मंचासीन हो गए। हद तो तब हो गई जब जबर्दस्त सेटिंग करते हुए लंगट सिंह महाविद्यालय के इतिहास के प्राध्यापक भोजनंदन सिंह जो गांधी के किरदार में जबर्दस्त प्रसिद्धि पा रहे थे को बेदखल कर एक पार्टी विशेष के गांधी बनकर मुजफ्फरपुर में ट्रेन में सवार हो लिए। शताब्दी के श्रीमान गांधी को यह भी नहीं पता था कि गांधी जब चंपारण आए थे तो उनका लिबास क्या था? गांधी का मजाक बना रहे इस कलाकार के अभिनय एवं उन्हें दी जा रही सेवा की स्थिति यह है उनके ठहरने के लिए गोरखबाबू का मकान नहीं मिल पाया तो आयोजकों ने एक होटल का कमरा दिला दिया। अब इनका नया मजाक यह रहा कि श्रीमान चंपारण सत्याग्रह की कथा को विद्रूप करते हुए जसौली पट्‌टी पहुंच गए, जहां नहीं पहुंच पाने एवं चंपाररण छोड़ने का सम्मन मिलने के कारण सत्याग्रह हुआ था। अब आयोजक तो इतिहास का इतना ज्ञान तो रखते नहीं कि गांधी हाथी पर सवार होकर जसौली पट्‌टी जा रहे थे, लेकिन इस कलाकार के लिए विदेश में बनी चार पैर की हाथी की बजाय जोंगा जीप जो विदेश में बनी है पर सवार करा दिया गया। तो इस कलाकार द्वारा अब कौन सा सत्याग्रह किया जाएगा। मुझे अभी तक यह नहीं मालूम हो पाया कि जसौली पट्‌टी में उन्हें लोमराज सिंह मिले की नहीं? क्योंकि उनकी भी आत्मा इतिहास के पन्ने में हो रहे जबर्दस्त छेड़छाड़ के कारण तड़पती होगी। हालांकि विश्ले्षक इसके पीछे राजनीतिक कारणों की बात करने लगे हैं। एक जाति विशेष के लोगों से कट रहे नेताजी खुद को उसके करीब लाने के लिए दनादन दांव चल रहे हैं, एक तीर से कई शिकार किए जा रहे हैं। घबराइए नहीं, अभी कई औऱ् गांधी मोतिहारी में अवतरित होनेवाले हैं? उनके द्वारा चंपारण सत्याग्रह का कौन सा पन्ना बदला जाएगा, यह भी देखना काफी रोचक होगा। खैर आनेवाले दिनों में कुछ राजनीतिक गांधी, कुछ शिक्षाविद् गांधी, कुछ पेशेवर गांधियों की चर्चा की जाएगी। शोध जारी…..

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